बस्तर के जंगलों में शुरू हुई बोड़ा की आवक, ₹5 हजार किलो तक पहुंची कीमत मानसून की पहली बारिश के साथ बाजारों में बढ़ी मांग
19 जून 2026 जगदलपुर :- बस्तर संभाग में मानसून की पहली अच्छी बारिश के साथ ही जंगलों की एक अनमोल प्राकृतिक सौगात बोड़ा (सरई बोड़ा) की आवक शुरू हो गई है। साल (सरई) के घने जंगलों में पेड़ों की जड़ों के आसपास प्राकृतिक रूप से उगने वाला यह दुर्लभ मशरूम इन दिनों स्थानीय बाजारों में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। अपनी बेहतरीन गुणवत्ता, अनूठे स्वाद और सीमित उपलब्धता के कारण बोड़ा की कीमत ₹2,000 से लेकर ₹5,000 प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है।
बस्तर के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में बोड़ा केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि पारंपरिक वन संपदा और स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। हर वर्ष मानसून की शुरुआत होते ही लोग इसके इंतजार में रहते हैं।
क्या है बोड़ा?
बोड़ा एक विशेष प्रकार का प्राकृतिक मशरूम है, जो केवल जंगलों में ही उगता है। इसे कृत्रिम रूप से उगाना बेहद कठिन माना जाता है। यह मुख्य रूप से साल (सरई) के पेड़ों की जड़ों के आसपास जमीन के भीतर विकसित होता है और बारिश के बाद सतह पर दिखाई देता है।

विशेषज्ञों के अनुसार बोड़ा का जीवन चक्र जंगल के प्राकृतिक वातावरण, मिट्टी की नमी और पेड़ों की जड़ों से जुड़ा होता है। यही कारण है कि इसकी खेती व्यावसायिक स्तर पर संभव नहीं हो पाई है।
स्वाद में बेजोड़, पोषण से भरपूर
बोड़ा को बस्तर का "जंगलों का सफेद सोना" भी कहा जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इसका स्वाद कई मांसाहारी व्यंजनों से भी अधिक लाजवाब होता है। इसकी सब्जी, भुजिया और पारंपरिक मसालों के साथ तैयार किए गए व्यंजन काफी लोकप्रिय हैं।
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार बोड़ा में प्रोटीन, विटामिन, खनिज तत्व और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।
आदिवासी महिलाओं की आय का प्रमुख स्रोत
बस्तर के ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी महिलाएं और ग्रामीण सुबह-सुबह जंगलों में जाकर बोड़ा एकत्रित करते हैं। इसके बाद वे इसे जगदलपुर, बकावंड, लोहंडीगुड़ा, दरभा, कोंडागांव, नारायणपुर और अन्य स्थानीय बाजारों में बेचते हैं।
मानसून के शुरुआती दिनों में बोड़ा की उपलब्धता कम होने के कारण इसकी कीमत काफी अधिक रहती है। कई परिवारों को इससे अच्छी आमदनी प्राप्त होती है, जिससे उनके दैनिक जीवन और घरेलू खर्चों में सहायता मिलती है।
बाजार में बढ़ी मांग
जगदलपुर के संडे मार्केट सहित विभिन्न स्थानीय बाजारों में इन दिनों बोड़ा खरीदने वालों की भीड़ देखी जा रही है। स्थानीय लोगों के अलावा बाहर से आने वाले पर्यटक और व्यापारी भी इसे खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं।
व्यापारियों का कहना है कि शुरुआती दिनों में गुणवत्ता वाले बोड़ा की कीमत ₹4,000 से ₹5,000 प्रति किलो तक पहुंच जाती है। जैसे-जैसे मानसून आगे बढ़ता है और उत्पादन बढ़ता है, कीमतों में कुछ कमी देखने को मिलती है।
जंगल और संस्कृति से जुड़ा विशेष रिश्ता
बोड़ा केवल एक वन उपज नहीं है, बल्कि बस्तर की पारंपरिक संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा है। आदिवासी समुदायों में इसे विशेष महत्व प्राप्त है और कई परिवार मानसून के मौसम में इसके व्यंजनों का विशेष रूप से आनंद लेते हैं।
वन विशेषज्ञों का मानना है कि बोड़ा जैसे प्राकृतिक उत्पाद जंगलों की जैव विविधता और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत हैं। इसलिए इनके संरक्षण के लिए जंगलों की सुरक्षा और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है l
मानसून की दस्तक के साथ बस्तर के जंगल एक बार फिर बोड़ा की खुशबू से महक उठे हैं। स्वाद, पोषण और बाजार मूल्य के कारण यह दुर्लभ प्राकृतिक मशरूम न केवल लोगों की थाली की शोभा बढ़ा रहा है, बल्कि आदिवासी परिवारों की आजीविका का भी महत्वपूर्ण साधन बन रहा है। आने वाले दिनों में बारिश बढ़ने के साथ बोड़ा की आवक और अधिक बढ़ने की संभावना है, जिससे स्थानीय बाजारों में इसकी रौनक और बढ़ेगी