जिस कर्रेगुट्टा में कभी गूंजती थीं गोलियां, आज वहां लहराया तिरंगा; गूंजा ‘वंदे मातरम्’
15 अगस्त 2026 बीजापुर :- बस्तर की आवाज़ छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले की कर्रेगुट्टा पहाड़ी ने एक ऐतिहासिक क्षण को अपने नाम किया। जिस क्षेत्र को दशकों तक माओवादी गतिविधियों के प्रमुख गढ़ के रूप में जाना जाता रहा, उसी पहाड़ी की चोटी पर पहली बार राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा शान से लहराया गया। तिरंगा फहराए जाने के साथ ही पूरा इलाका ‘वंदे मातरम्’ और ‘जय हिंद’ के नारों से गूंज उठा।

बस्तर में आयोजित तीन दिवसीय तिरंगा यात्रा का समापन कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर हुआ। यात्रा ने नारायणपुर, कोंडागांव, सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर से होते हुए करीब 600 किलोमीटर का सफर तय किया। यात्रा में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा, वन मंत्री केदार कश्यप, सांसद महेश कश्यप, पूर्व मंत्री महेश गागड़ा सहित बड़ी संख्या में सुरक्षा बल के जवान और नागरिक शामिल हुए।
नक्सल प्रभाव वाले क्षेत्र में बदली तस्वीर
कभी जिस इलाके में गोलियों की आवाज, हिंसा और माओवादी आतंक का भय लोगों के मन में बना रहता था, वहां अब राष्ट्रीय ध्वज के साथ शांति और विकास का संदेश दिखाई दे रहा है। कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर तिरंगा फहराया जाना सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और क्षेत्र में शासन की बढ़ती पहुंच के रूप में देखा जा रहा है।
तिरंगा फहराए जाने के दौरान पहाड़ी पर मौजूद जवानों और नागरिकों में खासा उत्साह दिखाई दिया। राष्ट्रभक्ति के नारों के बीच वातावरण पूरी तरह देशभक्ति के रंग में रंग गया।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने बताया ऐतिहासिक क्षण
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर तिरंगा फहराए जाने को पूरे छत्तीसगढ़ और बस्तर के लिए गर्व का विषय बताया। उन्होंने कहा कि जिन पहाड़ियों पर कभी हिंसा, भय और गोलियों की आवाज सुनाई देती थी, वहां आज देश की आन-बान-शान तिरंगा लहरा रहा है। यह बदलाव बस्तर में शांति, विकास और राष्ट्रीय एकता की नई तस्वीर पेश करता है।

उन्होंने कहा कि कुछ वर्ष पहले तक बस्तर के ऐसे इलाकों में तिरंगा फहराने की कल्पना करना भी मुश्किल था, लेकिन आज परिस्थितियां बदल रही हैं और घर-घर तिरंगा पहुंच रहा है।
कभी माओवादी गतिविधियों का प्रमुख इलाका रहा कर्रेगुट्टा
करे्रेगुट्टा की पहाड़ियां लंबे समय तक माओवादी गतिविधियों के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र रही हैं। इस इलाके को माओवादी कमांडर हिड़मा से जुड़े प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी गिना जाता रहा है। यहां आम लोगों की आवाजाही बेहद सीमित थी और सुरक्षा बलों के लिए भी पहुंच बनाना चुनौतीपूर्ण माना जाता था।
अब उसी क्षेत्र में तिरंगा फहराया जाना बदलाव का प्रतीक बन गया है। सुरक्षा बलों की मौजूदगी, सड़क और संचार जैसी सुविधाओं के विस्तार तथा प्रशासन की पहुंच बढ़ने से इलाके में नई गतिविधियां दिखाई दे रही हैं।
600 किलोमीटर की तिरंगा यात्रा का संदेश
तीन दिनों तक चली तिरंगा यात्रा ने बस्तर के कई जिलों को जोड़ा। नारायणपुर से शुरू होकर कोंडागांव, सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर तक पहुंची इस यात्रा का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, देशभक्ति और क्षेत्र में शांति का संदेश जन-जन तक पहुंचाना रहा।
करे्रेगुट्टा की चोटी पर तिरंगा फहराकर यात्रा का समापन होना प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह वह इलाका है जहां कभी माओवादी प्रभाव का डर था, लेकिन अब उसी जगह राष्ट्रध्वज की मौजूदगी बस्तर में बदलते हालात की तस्वीर सामने रख रही है।
कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर लहराता तिरंगा सिर्फ एक ध्वज नहीं, बल्कि उस बदलाव का प्रतीक है जिसमें भय और हिंसा से प्रभावित इलाकों में शांति, सुरक्षा, विकास और राष्ट्रीय एकता की उम्मीद मजबूत होती दिखाई दे रही है।