उपेक्षा की मार झेल रहा ऐतिहासिक दलपत सागर, सिकुड़ते अस्तित्व पर बढ़ी चिंता, अतिक्रमण और अवैध निर्माणों के बीच घिरा दलपत सागर

उपेक्षा की मार झेल रहा ऐतिहासिक दलपत सागर, सिकुड़ते अस्तित्व पर बढ़ी चिंता, अतिक्रमण और अवैध निर्माणों के बीच घिरा दलपत सागर
जगदलपुर - TIMES OF BASTAR

17 मई 2026 जगदलपुर :-  शहर की ऐतिहासिक पहचान और प्राकृतिक धरोहर माने जाने वाला दलपत सागर आज अपनी बदहाली और लगातार उपेक्षा को लेकर चर्चा में है। लगभग 400 वर्ष पुरानी यह कृत्रिम झील राजा दलपत देव काकतीय द्वारा वर्षाजल संरक्षण और सिंचाई व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए बनवाई गई थी। करीब 350 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला दलपत सागर कभी जगदलपुर की जीवनरेखा और पर्यटन का प्रमुख केंद्र माना जाता था, लेकिन वर्तमान में यह अपनी पहचान और अस्तित्व बचाने की चुनौती से जूझता नजर आ रहा है।

दलपत सागर के चारों ओर फैला क्षेत्र लंबे समय से शहरवासियों, पर्यटकों और स्थानीय व्यापारियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। झील के मध्य स्थित प्राचीन शिव मंदिर, शाम के समय रोशनी से जगमगाता परिसर और प्राकृतिक सौंदर्य इसकी खास पहचान रहे हैं। पहले यहां नौकायन जैसी गतिविधियां भी संचालित होती थीं, जिससे यह पर्यटन के लिहाज से और महत्वपूर्ण बनता था।

लेकिन बीते कुछ वर्षों में दलपत सागर की स्थिति को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। झील में बढ़ती जलकुंभी, गंदगी, सीमित सफाई और आसपास बढ़ते अतिक्रमण की शिकायतों ने इसकी हालत पर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि झील के आसपास अनियोजित निर्माण और बढ़ते दबाव के कारण दलपत सागर का दायरा धीरे-धीरे प्रभावित हो रहा है।

सामाजिक संगठन और जागरूक नागरिक समय-समय पर सफाई अभियान चलाकर दलपत सागर को बचाने की मुहिम में जुटे रहते हैं। कई बार स्थानीय स्तर पर श्रमदान और जनजागरूकता अभियान भी चलाए गए, लेकिन आरोप है कि निगम प्रशासन से अपेक्षित सहयोग और दीर्घकालिक योजना का अभाव इस प्रयास को कमजोर कर देता है।

शहरवासियों का मानना है कि सरकारें बदलती रहीं, घोषणाएं होती रहीं, योजनाएं बनती रहीं, लेकिन दलपत सागर के संरक्षण के लिए स्थायी और प्रभावी व्यवस्था आज तक नहीं बन पाई। करोड़ों रुपए के विकास और सौंदर्यीकरण के दावों के बीच भी झील की वास्तविक स्थिति सवालों के घेरे में है।

दलपत सागर केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि जगदलपुर के इतिहास, संस्कृति और पर्यटन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में इसकी लगातार अनदेखी और रखरखाव में कमी शहर के लोगों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।

कांग्रेस का हमला: “दलपत सागर भाजपा के लिए सफेद हाथी और कमाई का जरिया”

कांग्रेस जिला अध्यक्ष सुशील मौर्य ने दलपत सागर को लेकर भाजपा और नगर निगम प्रशासन पर तीखा हमला बोला। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि दलपत सागर भाजपा के लिए “सफेद हाथी” बन चुका है, जिसका उपयोग केवल कमाई के जरिये के रूप में किया जा रहा है।

सुशील मौर्य ने आरोप लगाया कि दलपत सागर के कायाकल्प और सफाई के नाम पर करोड़ों रुपए की घोषणाएं की गईं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता। उनके अनुसार लगभग 9 करोड़ 88 लाख रुपए दलपत सागर के विकास के लिए स्वीकृत बताए गए, लेकिन डेढ़ साल बीतने के बाद भी राशि और खर्च का स्पष्ट हिसाब सामने नहीं आया है।

मौर्य ने कहा कि भाजपा जनता को बड़े-बड़े दावे और झूठे आश्वासन देकर गुमराह कर रही है, जबकि झील की वास्तविक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस शासनकाल में दलपत सागर के सौंदर्यीकरण, प्रकाश व्यवस्था और सफाई पर बड़े स्तर पर कार्य हुए थे, लेकिन वर्तमान में सफाई के नाम पर केवल लीपापोती हो रही है।

महापौर का पलटवार: “कांग्रेस को बंद हुई लूट की चिंता सता रही”

कांग्रेस के आरोपों पर जवाब देते हुए महापौर संजय पांडे ने कहा कि दलपत सागर की सफाई का कार्य लगातार जारी है और नगर निगम इस ऐतिहासिक धरोहर को बेहतर बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

महापौर ने कहा कि कांग्रेस वर्षों तक नगर निगम और सत्ता में रहते हुए भ्रष्टाचार करती रही, जबकि भाजपा सरकार ने व्यवस्थाओं में बदलाव कर पारदर्शिता लाने का काम किया है।

संजय पांडे के अनुसार पिछले 15 महीनों में नगर निगम का एक रुपया भी दलपत सागर पर खर्च नहीं हुआ है और जिस 9.88 करोड़ रुपए की राशि की चर्चा हो रही है, वह अब तक प्राप्त ही नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस केवल राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए दलपत सागर का नाम इस्तेमाल कर रही है।

दलपत सागर को लेकर सियासत भले तेज हो गई हो, लेकिन शहरवासियों की प्राथमिक चिंता इस ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण और पुनर्जीवन है। अब देखना होगा कि आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर दलपत सागर को बचाने के लिए ठोस और स्थायी कदम कब उठाए जाते हैं।