बस्तर में धान खरीदी का बड़ा खेल! 28,243 मीट्रिक टन धान गायब, ₹89.30 करोड़ की शॉर्टेज  प्रबंधकों से होगी पाई-पाई वसूली 3 माह में राशि नहीं चुकाई तो FIR

बस्तर में धान खरीदी का बड़ा खेल! 28,243 मीट्रिक टन धान गायब, ₹89.30 करोड़ की शॉर्टेज  प्रबंधकों से होगी पाई-पाई वसूली 3 माह में राशि नहीं चुकाई तो FIR
जगदलपुर - TIMES OF BASTAR

08 सितम्बर 2026 जगदलपुर :-  छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में धान खरीदी व्यवस्था को लेकर एक बड़ी वित्तीय अनियमितता सामने आई है। खरीदी के बाद किए गए भौतिक सत्यापन में 28,243 मीट्रिक टन यानी करीब 2.82 लाख क्विंटल धान की कमी पाई गई है। इस धान की अनुमानित कीमत 89.30 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इतनी बड़ी मात्रा में धान के गायब होने की जानकारी सामने आने के बाद सहकारिता और खाद्य विभाग में हड़कंप मच गया है।

जांच में कई धान खरीदी केंद्रों पर सरकारी रिकॉर्ड और मौके पर उपलब्ध स्टॉक के बीच बड़ा अंतर पाया गया। कागजों में जहां धान का स्टॉक दर्ज था, वहीं भौतिक सत्यापन के दौरान उतनी मात्रा में धान मौके पर मौजूद नहीं मिला। इससे धान खरीदी और उसके भंडारण की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

तीन महीने में करनी होगी करोड़ों की भरपाई

प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित समिति प्रबंधकों और उत्तरदायी कर्मचारियों से शॉर्टेज की पूरी राशि वसूलने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए संबंधित जिम्मेदार लोगों को तीन महीने की समय-सीमा दी गई है।

प्रशासन ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर शॉर्टेज की राशि जमा नहीं की जाती है, तो संबंधित दोषी प्रबंधकों और अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

रिकॉर्ड में धान, लेकिन केंद्रों से गायब

जांच के दौरान सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि कई केंद्रों के दस्तावेजों में धान का स्टॉक दर्ज था, लेकिन मौके पर भौतिक रूप से उतना धान उपलब्ध नहीं था। इससे सवाल उठ रहा है कि आखिर रिकॉर्ड में दर्ज करोड़ों रुपये का धान गया कहां?

मामले में कागजी हेरफेर, स्टॉक में गड़बड़ी और बिचौलियों की संभावित भूमिका की भी जांच की जा रही है। हालांकि, इन आरोपों की वास्तविकता जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

सूखत के नाम पर नहीं चलेगा बहाना

धान की कमी को लेकर कुछ समितियों की ओर से सूखत यानी धान सूखने के कारण वजन कम होने का तर्क दिया गया। लेकिन जांच अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर सामने आई कमी को केवल प्राकृतिक वजन घटने से जोड़ने पर सवाल उठाए हैं।

अधिकारियों का मानना है कि सामान्य सूखत के नाम पर इतनी बड़ी मात्रा में धान की कमी को उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसी वजह से शॉर्टेज की जिम्मेदारी तय कर संबंधित समितियों से राशि वसूलने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

उठाव में देरी भी बनी बड़ी वजह

जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि खरीदी समाप्त होने के बाद कई केंद्रों से धान का समय पर उठाव नहीं हो पाया। लंबे समय तक बड़ी मात्रा में धान खुले में पड़ा रहा। इससे धान के खराब होने, वजन में कमी आने और स्टॉक के प्रबंधन में गड़बड़ी की स्थिति बनी।

लेकिन सवाल यह भी है कि यदि धान खराब हुआ या कम हुआ तो उसका रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक में इतना बड़ा अंतर कैसे पैदा हुआ?

89 करोड़ की कमी ने खड़े किए कई बड़े सवाल

बस्तर संभाग में 89.30 करोड़ रुपये मूल्य के धान की शॉर्टेज सामने आने के बाद अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती जिम्मेदारी तय करने और सरकारी नुकसान की पूरी भरपाई कराने की है।

मामले की जांच में यह भी देखा जा रहा है कि किन-किन खरीदी केंद्रों पर कितनी मात्रा में धान की कमी मिली, संबंधित समितियों के जिम्मेदार कौन हैं और रिकॉर्ड में दर्ज धान की वास्तविक स्थिति क्या थी।

अब होगी पाई-पाई की वसूली

प्रशासन ने साफ कर दिया है कि सरकारी धान के नुकसान को लेकर किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। संबंधित समिति प्रबंधकों और जिम्मेदार कर्मचारियों से शॉर्टेज की राशि की वसूली की जाएगी। तीन महीने की समय-सीमा के बाद भुगतान नहीं करने वालों के खिलाफ FIR और अन्य कानूनी कार्रवाई की चेतावनी ने मामले को और गंभीर बना दिया है।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि 28,243 मीट्रिक टन धान की कमी के लिए आखिर किसकी जिम्मेदारी तय होती है और 89.30 करोड़ रुपये के इस सरकारी नुकसान की वसूली कितनी जल्दी हो पाती है।