काछन देवी की परंपरा पर विवाद: पीहू दास और पनका समाज में नाराजगी, राष्ट्रपति से मुलाकात को लेकर उठे सवाल
24 अक्टूबर 2026 जगदलपुर,बस्तर :- विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा में काछन देवी की परंपरा को लेकर नया विवाद सामने आया है। आरोप है कि काछन देवी की रस्म निभाने वाली बालिका पीहू दास की जगह दूसरी बालिका को काछन देवी के रूप में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलवाया गया। इस घटनाक्रम से पीहू दास और पनका समाज में नाराजगी की बात सामने आई है।
पीहू दास के अनुसार, गांव के पुजारी ने उन्हें और उनके परिवार को राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए एसडीएम बकावण्ड ने राष्ट्रपति से मिलने आने की सूचना दी थी। ऐसे में उनकी जगह दूसरी बालिका को प्रस्तुत किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर यह बदलाव क्यों किया गया और इसकी जानकारी परिवार को दी गई थी या नहीं।

बस्तर दशहरा में काछन देवी की परंपरा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। ऐसे में परंपरा से जुड़ी बालिका की जगह किसी दूसरी बालिका को प्रस्तुत किए जाने के आरोप ने समाज की भावनाओं और परंपराओं के सम्मान को लेकर चर्चा तेज कर दी है।
विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा में इस वर्ष एक के बाद एक सामने आ रहे घटनाक्रमों ने परंपराओं के निर्वहन, प्रशासनिक व्यवस्था और आयोजन की गरिमा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जोगी की रस्म, रथ हादसे में एक व्यक्ति की मौत, मुरिया दरबार का कुछ ही मिनटों में समाप्त हो जाना और राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव को लेकर उठे सवालों के बाद अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात के मामले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है।
काछन देवी की परंपरा और पीहू दास की भूमिका
बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आस्था, लोक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। यहां काछन देवी की परंपरा का विशेष महत्व है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, काछन देवी से जुड़ी रस्म में बालिका की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। दशहरा पर्व के दौरान निभाई जाने वाली इस परंपरा को बस्तर की सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।

पीहू दास के कथन के अनुसार, गांव के पुजारी ने उन्हें और उनके परिवार को बताया था कि उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात करना है। इस सूचना के बाद परिवार को उम्मीद थी कि पीहू को राष्ट्रपति से मिलने का अवसर मिलेगा। लेकिन यदि अंततः उनकी जगह किसी दूसरी बालिका से मुलाकात कराई गई, तो इससे पीहू को मानसिक आघात पहुंचना स्वाभाविक है।
आखिर प्रशासन की क्या मजबूरी थी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि पीहू दास को राष्ट्रपति से मिलवाने की योजना थी, तो अंतिम समय में दूसरी बालिका को क्यों प्रस्तुत किया गया? क्या राष्ट्रपति के कार्यक्रम में बदलाव हुआ था? क्या सुरक्षा, समय-सारिणी या प्रोटोकॉल से जुड़ी कोई बाध्यता थी? या फिर स्थानीय परंपरा से जुड़े लोगों और प्रशासन के बीच समन्वय की कमी रही?
राष्ट्रपति का कार्यक्रम सुरक्षा और प्रोटोकॉल के लिहाज से संवेदनशील होता है, लेकिन ऐसे कार्यक्रमों में स्थानीय परंपराओं से जुड़े प्रतिनिधियों के चयन और उनकी भूमिका को लेकर भी पारदर्शिता आवश्यक है। यदि किसी कारण से सूची या व्यवस्था में बदलाव किया गया था, तो संबंधित परिवार को समय पर सूचना देना और स्थिति स्पष्ट करना प्रशासनिक संवेदनशीलता का हिस्सा होना चाहिए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में पनका समाज की नाराजगी, अगले वर्ष काछन देवी की पूजा में पीहू दास को शामिल नहीं करने की चेतावनी
पीहू दास के परिवार और पनका समाज के लोगों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि मुरिया दरबार और स्वदेशी मेला मंच के लिए भी उनका नाम सूची में था। समाज का दावा है कि पिछले 15 दिनों से प्रशासन उनसे संपर्क कर रहा था, लेकिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात के दौरान पीहू को मंच और प्रवेश द्वार पर रोक दिया गया। समाज ने कहा कि वे जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर इस मामले में जवाब मांगेंगे।

समाज ने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें उचित जवाब और सम्मान नहीं मिला, तो अगले वर्ष काछन देवी की पूजा-विधान में पीहू दास को शामिल नहीं किया जाएगा। समाज के लोगों ने इसे पनका समाज की उपेक्षा का मामला बताते हुए नाराजगी जताई।
पनका समाज और पुजारी ने कहा कि जिस बालिका को द्रौपदी मुर्मू से मिलाया गया वह बालिका अगले वर्ष प्रशासन काछन देवी बनाकर पूजा विधान करें
क्या बस्तर की परंपराएं महज औपचारिकता बनकर रह जाएंगी?
इस वर्ष बस्तर दशहरा के दौरान सामने आए विभिन्न विवादों को एक साथ देखें, तो आयोजन की व्यवस्थाओं और परंपराओं के सम्मान को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। जोगी की रस्म के निर्वहन को लेकर उठे सवाल, रथ हादसे में हुई मौत, मुरिया दरबार की अवधि और राजपरिवार की भूमिका को लेकर विवाद के बाद अब काछन देवी की रस्म निभाने वाली बालिका से जुड़ा मामला सामने आया है।
हालांकि, इन सभी घटनाओं के कारण और परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए प्रत्येक मामले की निष्पक्ष जांच और तथ्यों के आधार पर समीक्षा जरूरी है। फिर भी, लगातार उठ रहे सवाल यह संकेत देते हैं कि इतने बड़े ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आयोजन में परंपराओं के निर्वहन, सुरक्षा, समन्वय और संवाद को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
बस्तर दशहरा की पहचान उसकी विशिष्ट परंपराओं, आदिवासी आस्था और राजपरिवार सहित विभिन्न समुदायों की ऐतिहासिक भूमिका से है। इन परंपराओं को निभाने वाले लोगों को सम्मान और विश्वास में लेना आयोजन की मूल भावना का हिस्सा होना चाहिए।
प्रशासन से उठते प्रमुख सवाल
1. पीहू दास और उनके परिवार को राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए जगदलपुर आने की सूचना किसने और किस आधार पर दी थी?
2. यदि पीहू को मुलाकात के लिए चुना गया था, तो उनकी जगह दूसरी बालिका को प्रस्तुत करने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया?
3. क्या राष्ट्रपति के कार्यक्रम, सुरक्षा या प्रोटोकॉल में कोई बदलाव हुआ था? यदि हां, तो संबंधित परिवार को इसकी जानकारी क्यों और कब दी गई?
4. क्या काछन देवी की परंपरा से जुड़े पुजारी, परिवार और अन्य पारंपरिक प्रतिनिधियों से इस विषय पर चर्चा की गई?
5. क्या प्रशासन इस पूरे घटनाक्रम की समीक्षा कर स्थिति स्पष्ट करेगा, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो?
परंपराओं का सम्मान केवल मंचीय परिचय तक सीमित नहीं होना चाहिए
बस्तर दशहरा देश-दुनिया में अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। इसकी गरिमा केवल भव्य रथ, बड़े मंच, विशिष्ट अतिथियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि उन लोगों से भी बनी है जो पीढ़ियों से इन परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।
यदि काछन देवी की रस्म से जुड़ी बालिका को राष्ट्रपति से मिलने की उम्मीद दिलाई गई और बाद में उसे अवसर नहीं मिला, तो यह केवल एक मुलाकात का विषय नहीं रह जाता; यह संवाद, संवेदनशीलता और परंपराओं के सम्मान से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
अब सवाल यह है कि राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान यह बदलाव किन परिस्थितियों में हुआ? संबंधित प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।