सिलाई सिखाने के नाम पर रायपुर बुलाया, फैशन शो में कराया रैंप वॉक; पूर्व माओवादी महिलाओं ने जताई नाराजगी

सिलाई सिखाने के नाम पर रायपुर बुलाया, फैशन शो में कराया रैंप वॉक; पूर्व माओवादी महिलाओं ने जताई नाराजगी
जगदलपुर - TIMES OF BASTAR

18 अगस्त 2026 रायपुर/सुकमा :-  7 अगस्त 2026 को रायपुर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर आयोजित फैशन शो में पूर्व माओवादी महिलाओं के रैंप वॉक करने का मामला अब विवादों में घिरता नजर आ रहा है। कार्यक्रम के बाद सामने आए वीडियो और तस्वीरों को सरकार द्वारा पुनर्वास और सशक्तिकरण की मिसाल के तौर पर प्रस्तुत किया गया, लेकिन रैंप वॉक में शामिल कुछ पूर्व माओवादी महिलाओं ने दावा किया है कि उन्हें सिलाई प्रशिक्षण दिलाने के नाम पर सुकमा से रायपुर ले जाया गया था और वहां पहुंचने के बाद उन्हें रैंप वॉक की ट्रेनिंग दी गई।   

महिलाओं के मुताबिक, यदि उन्हें पहले से बताया जाता कि उन्हें फैशन शो में रैंप वॉक करना है, तो वे रायपुर जाने के लिए तैयार नहीं होतीं। वहीं, ग्रामोद्योग विभाग के अधिकारियों का कहना है कि महिलाओं की कार्यक्रम में भागीदारी उनकी सहमति से हुई थी और इसके लिए सहमति पत्र भी प्राप्त हुए थे।            

 सुकमा से रायपुर तक पहुंची महिलाएं            

 जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर रायपुर के दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में स्वदेशी कपड़ों और हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसी दौरान फैशन शो में पूर्व माओवादी महिलाओं ने कोसा सिल्क और पारंपरिक हथकरघा परिधान पहनकर रैंप वॉक किया।            

रैंप वॉक में सुकमा जिले से कुल 10 महिलाओं के शामिल होने की बात सामने आई है। इनमें नौ महिलाएं ऐसी थीं, जिन्होंने पिछले कुछ समय में अलग-अलग परिस्थितियों में माओवादी संगठन छोड़कर आत्मसमर्पण किया था और वर्तमान में पुनर्वास व्यवस्था के तहत रह रही थीं। एक महिला पुलिसकर्मी भी उनके साथ थी।            

 महिलाओं का आरोप है कि उन्हें जगदलपुर में सिलाई का प्रशिक्षण दिलाने की बात कहकर सुकमा से रवाना किया गया था, लेकिन उन्हें जगदलपुर के बजाय सीधे रायपुर ले जाया गया।           

होटल में कई दिनों तक दी गई रैंप वॉक की ट्रेनिंग            

महिलाओं के अनुसार, वे अगस्त की शुरुआत में रायपुर पहुंचीं और उन्हें एक होटल में ठहराया गया। इसके बाद कई दिनों तक उन्हें रैंप पर चलने, मंच पर प्रस्तुति देने और फैशन शो के तौर-तरीकों की ट्रेनिंग दी गई।            

उनका कहना है कि उन्हें रैंप वॉक के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी। ट्रेनिंग के दौरान मुंबई से आए कुछ लोगों ने उन्हें फैशन शो और रैंप वॉक के बारे में समझाया।            

 एक पूर्व माओवादी महिला ने कहा कि उन्हें सिलाई का काम सिखाने की बात कहकर लाया गया था, लेकिन यहां सिलाई मशीन की ट्रेनिंग के बजाय उन्हें रैंप पर चलना सिखाया जाने लगा। महिला के मुताबिक, शुरुआत में उन्हें कुछ समझ नहीं आया और बाद में काफी मुश्किल से उन्होंने मंच पर प्रस्तुति दी।            

 एक अन्य महिला ने आरोप लगाया कि यदि उन्हें पहले ही बता दिया जाता कि फैशन शो में भाग लेना है, तो वे रायपुर आने से मना कर देतीं। उनका कहना था कि उन्होंने प्रशिक्षण के नाम पर यह सोचकर यात्रा की थी कि कोई ऐसा हुनर सीखने को मिलेगा जो आगे रोजगार में काम आएगा।           

महिला पुलिसकर्मी ने भी कही जानकारी पहले नहीं होने की बात   

सुकमा पुनर्वास केंद्र से जुड़ी महिला पुलिसकर्मी सीमा पोयाम भी इन महिलाओं के साथ रायपुर गई थीं। उनके मुताबिक, उन्हें भी ऊपर से मिले निर्देश के आधार पर महिलाओं को रायपुर ले जाना था।            

 महिला पुलिसकर्मी ने कथित तौर पर यह पुष्टि की कि महिलाओं को पहले केवल सिलाई से संबंधित प्रशिक्षण के लिए ले जाने की जानकारी दी गई थी। रैंप वॉक में भाग लेने की बात उन्हें पहले से पता नहीं थी।            

 पारिश्रमिक को लेकर भी अलग-अलग दावे            

 कार्यक्रम में शामिल महिलाओं ने बताया कि उन्हें रैंप वॉक के बदले कोई पैसा नहीं मिला। उनके अनुसार, उन्हें एक बैग दिया गया, जिसमें साड़ी और अन्य सामान था।            

 वहीं ग्रामोद्योग विभाग के सुकमा प्रभारी सचिव राजेश सिंह राणा का कहना है कि कार्यक्रम में शामिल प्रत्येक महिला को 10 हजार रुपये की राशि दी जानी थी और यह राशि बैंक खाते में भेजे जाने की बात कही गई। इसके अलावा उन्हें हथकरघा से तैयार कपड़े भी उपहार में दिए जाने की जानकारी दी गई।            

 महिलाओं का कहना है कि उनसे दोबारा पूछे जाने पर भी उन्होंने यही बताया कि उनके बैंक खातों में उन्हें उक्त राशि प्राप्त नहीं हुई है और उन्हें मुख्य रूप से एक सूती साड़ी तथा ट्रैक सूट दिया गया था।            

विभाग ने कहा—महिलाओं की सहमति से हुआ कार्यक्रम            

 ग्रामोद्योग विभाग के अधिकारी राजेश सिंह राणा ने महिलाओं के आरोपों से अलग पक्ष रखते हुए कहा कि पुनर्वास केंद्र में महिलाओं से उनके रोजगार और भविष्य की योजनाओं को लेकर चर्चा हुई थी। इसी दौरान कुछ महिलाओं की फैशन शो में भाग लेने की इच्छा सामने आने का दावा उन्होंने किया।            

उनके अनुसार, राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के कार्यक्रम में स्वदेशी कपड़ों को बढ़ावा देने के लिए फैशन शो आयोजित किया गया था और महिलाओं के आत्मविश्वास को देखते हुए उन्हें भी इसमें शामिल किया गया।            

अधिकारी ने यह भी कहा कि जिला प्रशासन की ओर से महिलाओं की सहमति से संबंधित पत्र प्राप्त हुए थे।            

सहमति पत्र पर भी उठे सवाल            

मामले में कथित तौर पर कुछ सहमति पत्र भी सामने आने की बात कही गई है। इन पत्रों में स्वदेशी फैशन शो अथवा प्रदर्शनी में भाग लेने की इच्छा का उल्लेख बताया गया है।            

हालांकि, महिलाओं का कहना है कि उन्हें हिंदी में लिखे दस्तावेज की पूरी जानकारी नहीं थी। उनके मुताबिक, अधिकारियों ने जहां हस्ताक्षर करने को कहा, उन्होंने वहां हस्ताक्षर कर दिए।            

यही बिंदु अब पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल बनकर सामने आया है कि क्या महिलाओं को कार्यक्रम की वास्तविक प्रकृति और रैंप वॉक में उनकी भूमिका के बारे में स्पष्ट जानकारी देकर उनकी स्वतंत्र सहमति ली गई थी।            

सशक्तिकरण की तस्वीर या सहमति का सवाल?            

 कार्यक्रम की तस्वीरें सामने आने के बाद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इसे बस्तर में बदलाव की नई कहानी बताया था। उनके संदेश में कहा गया कि जिन हाथों में कभी हथियार थे, वे अब सम्मान, आत्मविश्वास और उम्मीद की नई कहानी बुन रहे हैं।            

लेकिन पूर्व माओवादी महिलाओं के कथित आरोपों ने इस पूरे कार्यक्रम के दूसरे पहलू को सामने ला दिया है। सवाल यह है कि पुनर्वासित महिलाओं को वास्तव में रोजगार और कौशल प्रशिक्षण दिया जा रहा था या उनकी सहमति और जानकारी के स्तर को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।            

 सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता बेला भाटिया ने भी इस तरह के आयोजन को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पूर्व माओवादी महिलाओं को केवल फैशन शो में प्रस्तुत कर देना उनके वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संघर्षों का समाधान नहीं है। उनके मुताबिक, महिलाओं के पुनर्वास और सशक्तिकरण का मूल्यांकन उनके रोजगार, शिक्षा, अधिकारों और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता से होना चाहिए।            

 अब सामने हैं कई सवाल            

 इस पूरे मामले में पूर्व माओवादी महिलाओं के आरोप और सरकारी विभाग का पक्ष एक-दूसरे से अलग दिखाई दे रहा है। एक तरफ महिलाएं कह रही हैं कि उन्हें सिलाई प्रशिक्षण के नाम पर रायपुर लाया गया और रैंप वॉक के बारे में पहले जानकारी नहीं थी, वहीं विभाग का दावा है कि उनकी सहमति से ही कार्यक्रम में भागीदारी कराई गई।            

ऐसे में अब यह सवाल महत्वपूर्ण है कि महिलाओं को कार्यक्रम में शामिल करने से पहले उन्हें क्या जानकारी दी गई थी, सहमति पत्र की भाषा उन्हें समझाई गई थी या नहीं, और यदि 10-10 हजार रुपये पारिश्रमिक दिया जाना था तो उसकी वास्तविक स्थिति क्या है।            

पूर्व माओवादी महिलाओं का पुनर्वास केवल हथियार छोड़ने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके लिए कौशल प्रशिक्षण, स्थायी रोजगार, सम्मानजनक जीवन और अपनी इच्छा से निर्णय लेने का अधिकार ही वास्तविक पुनर्वास और सशक्तिकरण की कसौटी हो सकता है।