27 जिंदगियों की मौत का 13 साल बाद फैसला: झीरम घाटी मामले में 10 दोषियों को मृत्यु दंड
16 सितंबर 2026 जगदलपुर :- छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित और देश को झकझोर देने वाले झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने करीब 13 साल बाद बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले में दोषी ठहराए गए सभी 10 आरोपियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने भी अपने आधिकारिक रिकॉर्ड में जगदलपुर की विशेष अदालत द्वारा झीरम घाटी हमले से जुड़े 10 आरोपी कैडरों को सजा सुनाए जाने की पुष्टि की है।
25 मई 2013 को बस्तर की दरभा क्षेत्र स्थित झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया था। हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, कांग्रेस नेता उदय मुदलियार सहित कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई थी। उपलब्ध ताजा रिपोर्टों के अनुसार इस हमले में 27 लोगों की जान गई थी।
13 साल चली न्यायिक प्रक्रिया
झीरम मामले की जांच बाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंपी गई। एनआईए ने मामले में आरोपियों के खिलाफ विस्तृत जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से 101 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए। गिरफ्तार किए गए 11 आरोपियों में से एक की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई, जबकि शेष 10 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई जारी रही।
5 सितंबर 2026 को विशेष एनआईए अदालत ने सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया था और सजा के बिंदु पर सुनवाई के लिए 16 सितंबर की तारीख निर्धारित की थी।
अदालत के फैसले के बाद अब आगे की कानूनी प्रक्रिया
मृत्युदंड का यह फैसला तत्काल अंतिम रूप से लागू नहीं होता। दोषियों को ऊपरी अदालत में अपील का कानूनी अधिकार है। मृत्युदंड के मामलों में संबंधित उच्च न्यायालय की पुष्टि की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होती है।
एनआईए के अनुसार मामले की सुनवाई लंबे समय तक चली और अभियोजन ने आरोपों के समर्थन में बड़ी संख्या में दस्तावेज और गवाह अदालत के सामने प्रस्तुत किए।
झीरम हमले में घायल कांग्रेस नेता राजीव नारंग बोले—फैसले की भी जांच हो’
झीरम घाटी हमले में घायल हुए कांग्रेस नेता राजीव नारंग ने अदालत के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामले में मृत्युदंड पाने वाले 10 आरोपियों की भूमिका की गहनता से समीक्षा की जानी चाहिए।
नारंग का कहना है कि झीरम हमले के पीछे जिन बड़े नक्सली नेताओं की भूमिका बताई जाती रही है, उनमें से कई प्रमुख नाम इस मुकदमे में सामने नहीं आ सके। उनका आरोप है कि छोटे स्तर पर नक्सलियों को रसद या अन्य सहायता पहुंचाने के आरोप में पकड़े गए लोगों को मामले में मोहरा बनाया गया और उन्हें कठोरतम सजा मिली।
उन्होंने मांग की कि झीरम मामले की व्यापक और निष्पक्ष पुनर्समीक्षा की जाए तथा घटना के पीछे वास्तविक साजिश और मुख्य जिम्मेदार लोगों की भूमिका की भी जांच हो। उन्होंने यह भी कहा कि जो बड़े नक्सली नेता बाद में आत्मसमर्पण कर चुके हैं, उनकी भूमिका की भी कानून के अनुसार जांच की जानी चाहिए।
हालांकि राजीव नारंग के इन आरोपों और मांगों को उनके राजनीतिक दृष्टिकोण के रूप में ही देखा जाना चाहिए; अदालत के फैसले की वैधता और दोषियों की अंतिम कानूनी स्थिति आगे की अपीलीय प्रक्रिया से तय होगी।
क्या था झीरम घाटी हमला?
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा सुकमा से लौट रही थी। दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी में माओवादियों ने काफिले को घेरकर हमला किया। हमले में भारी संख्या में हथियारबंद माओवादी शामिल होने की बात जांच में सामने आई थी। यह हमला छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास की सबसे गंभीर हिंसक घटनाओं में गिना जाता है।
इस हमले में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को भारी नुकसान हुआ। महेंद्र कर्मा, जिन्हें नक्सलवाद विरोधी सलवा जुडूम आंदोलन से जोड़ा जाता था, हमले में मारे गए। तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल भी मृतकों में शामिल थे।
13 साल बाद आया फैसला, लेकिन कई सवाल अभी बाकी
झीरम घाटी मामले में अदालत के फैसले के बाद एक तरफ 13 वर्षों से चल रही न्यायिक प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण चरण का समापन हुआ है, वहीं दूसरी ओर घटना की व्यापक साजिश, फरार आरोपियों और हमले के पीछे मौजूद अन्य संदिग्ध भूमिकाओं को लेकर सवाल सार्वजनिक चर्चा में बने हुए हैं।
अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए 10 लोगों को मृत्युदंड सुनाया गया है, लेकिन अंतिम कानूनी स्थिति अपील और उच्च न्यायालय की प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।
झीरम घाटी सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास की ऐसी घटना है जिसकी स्मृति आज भी बस्तर और पूरे प्रदेश में गहरी है।