46 साल पहले बस्तर की जेल और अदालत के इतिहास में दर्ज दो दुर्लभ मामले: एक में हुई फांसी दूसरे में हाईकोर्ट से मिली राहत

46 साल पहले बस्तर की जेल और अदालत के इतिहास में दर्ज दो दुर्लभ मामले: एक में हुई फांसी दूसरे में हाईकोर्ट से मिली राहत
जगदलपुर - TIMES OF BASTAR

17 सितम्बर 2026 जगदलपुर :- बस्तर का इतिहास केवल राजपरंपरा, आदिवासी संस्कृति, आंदोलनों और नक्सल घटनाओं तक सीमित नहीं है। बस्तर की न्यायिक व्यवस्था और जेल इतिहास में भी ऐसे कई मामले दर्ज हैं, जिनकी चर्चा आज भी पुराने न्यायिक दस्तावेजों और स्थानीय स्मृतियों में होती है। इनमें 1980 के दशक से जुड़े दो मृत्युदंड के मामले विशेष रूप से उल्लेखनीय बताए जाते हैं।

एक मामले में रामगोपाल यादव नामक सरकारी कर्मचारी को कलेक्टर के रीडर की हत्या के मामले में मृत्युदंड दिया गया और स्थानीय जानकारी के अनुसार जगदलपुर केंद्रीय जेल के फांसीघर में सजा का निष्पादन हुआ। वहीं दूसरे मामले में एक व्यक्ति को अपनी पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के मामले में जगदलपुर की अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी, लेकिन बाद में उच्च न्यायालय ने उसे बरी कर दिया। दूसरे मामले की सटीक पहचान और न्यायिक विवरण की स्वतंत्र पुष्टि के लिए पुराने अभिलेखों की जरूरत है।

रामगोपाल यादव का मामला: जगदलपुर जेल की आखिरी फांसी होने का दावा

स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार रामगोपाल यादव तत्कालीन लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) में कर्मचारी थे। उन पर बस्तर के तत्कालीन कलेक्टर के रीडर की हत्या का गंभीर आरोप लगा था।

मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने उन्हें हत्या का दोषी माना और मृत्युदंड की सजा सुनाई। इसके बाद न्यायालय के आदेश के अनुसार जगदलपुर केंद्रीय जेल में सजा के निष्पादन की प्रक्रिया पूरी की गई।

स्थानीय इतिहास से जुड़े लोगों के अनुसार जगदलपुर केंद्रीय जेल के फांसीघर में रामगोपाल यादव को फांसी दी गई थी। यह घटना 1980 के दशक के अंतिम वर्षों, लगभग 1988-89 के आसपास की बताई जाती है।

हालांकि इस मामले की सटीक तारीख, मुकदमा क्रमांक, अदालत के आदेश और फांसी के आधिकारिक रिकॉर्ड की सार्वजनिक ऑनलाइन पुष्टि नहीं मिल सकी है। इसलिए इसे फिलहाल स्थानीय ऐतिहासिक विवरण के रूप में प्रस्तुत किया जाना उचित होगा।

दूसरा मामला: पत्नी और तीन बच्चों की हत्या, अदालत ने सुनाई फांसी

इसी दौर का एक और मामला बस्तर के पुराने न्यायिक इतिहास में चर्चा का विषय रहा है। स्थानीय जानकारी के मुताबिक, 1980 से 1985 के दशक के आसपास एक व्यक्ति पर अपनी पत्नी और तीन बच्चों की हत्या का आरोप लगा था।

बताया जाता है कि मामला जगदलपुर की अदालत तक पहुंचा और सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपी को मृत्युदंड की सजा सुनाई। इस फैसले के बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा।

इसके बाद उच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई हुई और उपलब्ध स्थानीय विवरण के अनुसार उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के मृत्युदंड के फैसले को पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

इस मामले की खासियत यही है कि निचली अदालत से फांसी की सजा मिलने के बावजूद उसका निष्पादन नहीं हुआ और मामला उच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा के बाद अलग परिणाम तक पहुंचा।

हालांकि इस मामले में कई अहम जानकारियां अभी तलाश का विषय

इस पुराने मामले में आरोपी का नाम, हत्या की सटीक तारीख, मृतकों की पहचान, मुकदमा क्रमांक, जगदलपुर अदालत का फैसला और हाईकोर्ट के अंतिम आदेश की प्रति अभी सार्वजनिक स्रोतों में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं मिली है।

इसलिए इस घटना को प्रकाशित करते समय आरोपी का नाम या घटना की अन्य अपुष्ट जानकारी जोड़ने से बचना जरूरी होगा, जब तक पुराने न्यायालयीन अभिलेखों से इसकी पुष्टि न हो जाए।

एक ही दौर में मृत्युदंड के दो अलग-अलग परिणाम

बस्तर के न्यायिक इतिहास के संदर्भ में इन दोनों मामलों को साथ रखकर देखें तो एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है। रामगोपाल यादव के मामले में स्थानीय विवरण के अनुसार अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा का जगदलपुर केंद्रीय जेल में निष्पादन हुआ।

वहीं दूसरे मामले में निचली अदालत द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा और आरोपी को वहां से राहत मिलने की बात सामने आती है।

यानी एक मामले में मृत्युदंड अंतिम रूप से लागू हुआ, जबकि दूसरे में न्यायिक अपील की प्रक्रिया ने मामले का परिणाम बदल दिया।

जगदलपुर जेल का फांसीघर बना इतिहास का हिस्सा

जगदलपुर केंद्रीय जेल का फांसीघर आज बस्तर के जेल इतिहास से जुड़े उन अध्यायों का हिस्सा है, जिनके बारे में नई पीढ़ी को बहुत कम जानकारी है।

स्थानीय स्तर पर रामगोपाल यादव की फांसी को जगदलपुर जेल में दी गई आखिरी फांसी बताया जाता है। यदि जेल विभाग के पुराने अभिलेख इस बात की पुष्टि करते हैं, तो यह घटना जगदलपुर केंद्रीय जेल के इतिहास में विशेष महत्व रखती है।

पुराने जेल रिकॉर्ड, न्यायालयीन फैसले, हाईकोर्ट के अभिलेख और तत्कालीन समाचार-पत्र इस इतिहास को प्रमाणित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

आज फिर चर्चा में आया जगदलपुर और मृत्युदंड

वर्षों बाद जगदलपुर में मृत्युदंड का विषय एक बार फिर चर्चा में है। झीरम घाटी हत्याकांड में जगदलपुर की विशेष NIA अदालत ने सितंबर 2026 में 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया है। रिपोर्टों के अनुसार इस सजा का अमल उच्च न्यायालय की पुष्टि के बाद ही संभव होगा। 

इस घटनाक्रम ने बस्तर के पुराने न्यायिक इतिहास और जगदलपुर केंद्रीय जेल में कभी मौजूद फांसीघर की यादों को भी फिर चर्चा में ला दिया है।

बस्तर के न्यायिक इतिहास का अनकहा अध्याय

रामगोपाल यादव का मामला और पत्नी तथा तीन बच्चों की हत्या से जुड़ा दूसरा मामला—दोनों अपने-अपने तरीके से बस्तर के न्यायिक इतिहास के महत्वपूर्ण अध्याय बताए जाते हैं।

एक मामले में मृत्युदंड का निष्पादन हुआ, जबकि दूसरे में उच्च न्यायालय की प्रक्रिया के बाद आरोपी को बरी किए जाने की बात सामने आती है। इन घटनाओं का पूरा और प्रमाणित इतिहास सामने लाने के लिए 1980 के दशक के न्यायालयीन रिकॉर्ड, जेल रजिस्टर, हाईकोर्ट के पुराने फैसले और तत्कालीन अखबारों की प्रतियां महत्वपूर्ण स्रोत हो सकती हैं।