भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल और IAS अधिकारी अमित कटारिया के कथित विवाद ने बढ़ाई सियासी हलचल, प्रशासनिक कार्यशैली पर उठे सवाल जनप्रतिनिधियों की अनदेखी के आरोपों ने संगठन और प्रशासन के तालमेल पर खड़े किए प्रश्न
2 अगस्त 2026 रायपुर :- प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों वरिष्ठ भाजपा सांसद एवं चार बार प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके बृजमोहन अग्रवाल तथा वरिष्ठ IAS अधिकारी अमित कटारिया के बीच कथित विवाद को लेकर चर्चाओं का दौर तेज है।
विभिन्न राजनीतिक और प्रशासनिक सूत्रों के हवाले से यह चर्चा सामने आई है कि एक बैठक के दौरान अधिकारी द्वारा सांसद से कथित तौर पर "जो करना है कर लो..." जैसी टिप्पणी किए जाने का मामला सामने आया। हालांकि, इस कथित बातचीत की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही दोनों पक्षों की ओर से इस संबंध में विस्तृत सार्वजनिक बयान जारी किया गया है।
अब बृजमोहन अग्रवाल और अमित कटारिया के बीच सामने आए इस कथित विवाद की चर्चाओं ने एक बार फिर प्रशासनिक कार्यशैली और जनप्रतिनिधियों के साथ समन्वय के मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया है।
इस कथित घटनाक्रम के सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय तथा संवाद की स्थिति को लेकर बहस शुरू हो गई है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक अधिकारियों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच सम्मानजनक संवाद और बेहतर तालमेल आवश्यक है, क्योंकि दोनों ही जनता की समस्याओं के समाधान और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
समर्थकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बृजमोहन अग्रवाल लंबे समय से प्रदेश की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं। वे चार बार प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं और वर्तमान में रायपुर से सांसद हैं। ऐसे में यदि किसी वरिष्ठ जनप्रतिनिधि के साथ कथित रूप से इस प्रकार का व्यवहार होता है, तो यह स्वाभाविक रूप से चर्चा और राजनीतिक प्रतिक्रिया का विषय बनता है। उनका तर्क है कि यदि वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों की बातों को अपेक्षित महत्व नहीं मिलता, तो जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे पार्टी कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की समस्याओं के निराकरण को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं।
भाजपा संगठन से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव के समय संगठन के कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधि ही सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। इसलिए प्रशासन और संगठन के बीच बेहतर समन्वय सरकार की कार्यप्रणाली और जनविश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है।
पहले भी सुर्खियों में रह चुके हैं अमित कटारिया
IAS अधिकारी अमित कटारिया इससे पहले भी अपने कार्यकाल के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रह चुके हैं। वे जब जगदलपुर के कलेक्टर थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान उनके स्वागत के समय काला चश्मा पहने रहने को लेकर व्यापक विवाद हुआ था। उस समय इस घटनाक्रम की देशभर में चर्चा हुई थी और प्रोटोकॉल तथा प्रशासनिक शिष्टाचार को लेकर विभिन्न स्तरों पर बहस भी छिड़ी थी। बाद में यह मामला लंबे समय तक राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चाओं का हिस्सा बना रहा।
आप को बता दें की आईएएस (IAS) अमित कटारिया भारतीय प्रशासनिक सेवा के 2004 बैच के छत्तीसगढ़ कैडर के एक बेहद चर्चित और वरिष्ठ अधिकारी हैं। उन्हें भारत के सबसे अमीर आईएएस अधिकारियों में गिना जाता है, जिनकी अनुमानित कुल संपत्ति ₹8.90 करोड़ है। वह अपनी सख्त प्रशासनिक छवि और जनसेवा के लिए केवल ₹1 टोकन सैलरी लेने के फैसले को लेकर देश भर में मशहूर हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन और जनप्रतिनिधि एक-दूसरे के पूरक हैं। सरकारी योजनाओं का सफल क्रियान्वयन तभी संभव है, जब दोनों के बीच पारस्परिक सम्मान, संवाद और समन्वय बना रहे। किसी भी प्रकार का टकराव या संवादहीनता अंततः शासन-प्रशासन की कार्यक्षमता और जनता के हितों को प्रभावित कर सकती है।
रायपुर से भाजपा सांसद Brijmohan Agrawal ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अमित कटारिया के खिलाफ कथित दुर्व्यवहार और फोन कॉल का जवाब न देने पर लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष विशेषाधिकार हनन (Privilege Notice) का नोटिस प्रस्तुत किया है। आरोप है कि अधिकारी ने सांसद के फोन और प्रोटोकॉल की अनदेखी की और बहस के दौरान अनुचित भाषा का प्रयोग किया।
विवाद के मुख्य बिंदुकॉल और संदेशों की अनदेखी:
सांसद बृजमोहन अग्रवाल का आरोप है कि एक वरिष्ठ जनप्रतिनिधि (सांसद) के फोन और आधिकारिक संदेशों का जवाब न देना केंद्रीय प्रोटोकॉल और संविधान के अनुच्छेद 105 का उल्लंघन है।कथित दुर्व्यवहार: बातचीत के दौरान आईएएस अधिकारी द्वारा कथित तौर पर "जो करना है कर लो!" (Do whatever you want!) जैसे शब्दों का उपयोग किए जाने का मामला सामने आया है
विशेषाधिकार समिति में मामला:
सांसद ने लोकसभा अध्यक्ष से नियम 227 के तहत इस मामले को विशेषाधिकार समिति को भेजने और अधिकारी के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है। लोकसभा सचिवालय ने इस पर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है।
फिलहाल इस पूरे कथित प्रकरण पर न तो सांसद बृजमोहन अग्रवाल और न ही IAS अधिकारी अमित कटारिया की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। यदि भविष्य में इस मामले पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण, जांच या तथ्य सार्वजनिक होते हैं, तो उसके बाद ही पूरे घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। ऐसे में उपलब्ध जानकारी के आधार पर इस मामले को फिलहाल राजनीतिक चर्चाओं और कथित दावों के रूप में ही देखा जा रहा है।